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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

अकार का नया अंक

अकार का नया अंक नेट पर...

नई सदी के कथाकारों की पहली पीढ़ी पर केन्द्रित अंक

अकार 37

 
"पुनर्वास बस्तियों में लिखी जा रही साहित्य की नई इबारत.."


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जीवेश प्रभाकर
(उप संपादक)

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

राहुल गांधी के बहाने

राहुल गांधी के बहाने
जीवेश प्रभाकर

लोकसभा की आहट के साथ ही कॉंग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का देश के विभन्न क्षेत्रों में दौरा किया जा रहा है ।एक नए तेवर और योजना के साथ वे जगह जगह चौपाल लगा रहे हैं और अपने कार्यकर्ताओं से रूबरू भी हो रहे हैं । हालांकि काफी देर से इसे शुरु किया गया मगर यह काफी कारगर साबित हो सकता है । उल्लेखनीय है कि हाल ही में राहुल गांधी ने लगभग एक दशक के पश्चात एक साक्षात्कार दिया था । यह साक्षात्कार काफी चर्चा में है । देखा जाए तो यह मोदी के लिए एक चुनौती भी है मगर इसे इस रूप में देखने की बजाय यदि ये कहा जाए कि इस साक्षात्कार से राहुल एक नए रूप में सामने आए हैं तो गलत नहीं होगा । कुछ विवादित मुद्दों पर उनके जवाब से बवाल जरूर मचा हुआ है मगर आज की राजनीति में ऐसे विवाद ही चर्चा में रखते हैं । राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है चाहे उससे विवाद ही क्यों न हो मगर जनता से जुड़ने का यह सबसे बेहतर माध्यम है ।
विगत दिनो संपन्न विधानसभा चुनावों में पूरे देश में कॉंग्रेस की भद पिटी , सिर्फ छत्तीसगढ़ में उनकी साख में कुछ इजाफा हुआ । हालांकि सीटों के लिहाज से कोई फायदा नहीं हुआ मगर भाजपा और कॉंग्रेस में वोट प्रतिशत  का अंतर मात्र 0.7 % रहा जिससे कॉंग्रेस को छत्तीसगढ़ में  आगामी लोकसभा के लिए कुछ उम्मीद नजर आने लगी।  इस  बार के आम चुनाव कॉंग्रेस के लिए काफी मुश्किल भरे होंगे इसकी संभावना ज्यादा है । विगत 10 वर्षों से केन्द्र में सत्तारूढ़ कॉंग्रेस से आम जनता की उम्मीदें टूट चुकी हैं और वो एक नए विकल्प की तलाश में है । हालांकि ऐसा कोई निश्चित और सशक्त विकल्प अब तक जनता के सामने नहीं उभरा है । दिल्ली में सरकार बनाने के पश्चात एक बड़े तबके द्वारा आम आदमी पार्टी से भी काफी उम्मीदें की जाने लगी हैं । निश्चित रूप से विकल्पहीनता से जूझते आम जन के पास नए विकल्प को आजमाने की संभावनाएं जरूर बनती हैं। नरेन्द्र मोदी को आगे कर भाजपा ने अपनी चुनौती पेश की है हालांकि आम जन अभी तक इससे इत्तेफाक रखता दिख नहीं रहा है मगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार का ग्राफ जिस तेजी से नीचे की ओर जा रहा है उसके चलते बनती उम्मीदों के टूटने का भय होता जा रहा है । यदि कॉंगेस अपनी गिरती साख बचाने में नाकामयाब रही तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा ।  देखा जाए तो यह चुनाव भाजपा के लिए भी सबसे निर्णायक कहा जा सकता है । भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के रूप में अपना ब्रहमास्त्र चला दिया है । अगर इस बार के आम चुनाव में मोदी को आशातीत सफलता न मिली तो भाजपा एक लम्बे समय के लिए हाशिए पर जा सकती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता । वहीं दूसरी ओर राहुल को इस चुनाव में प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित न किया जाना कॉंग्रेस की सबसे चतुर रणनीति का परिचायक है । ये सभी जानते हैं कि यदि कॉंग्रेस किसी तौर सरकार बनाने के करीब पहुंच पाई तो निःसंदेह राहुल ही प्रधानमंत्री होंगे ,मगर यदि भाजपा सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत के जरा ज्यादा दूर रह जाती है तो अन्य दलों के समर्थन के लिए संभवतः मोदी को बलि का बकरा बनने से नहीं रोका जा सकता ।
   
आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पूरे देश में कॉंग्रेस के लिए कोई उम्मीद अगर बचती है तो वो सिर्फ बेहतर और सक्षम प्रत्याशी का चयन ही है । राहुल गांधी पूरे देश में कॉंग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की वकालत करते फिर रहे हैं । साथ ही वे आम आदमी पार्टी का ही फंडा लेकर आम जन से रायशुमारी के भी तमाम हथकंडे अपना रहे हैं जिससे कुछ राहत जरूर मिल सकती है मगर इसे व्यवहार में अमल किया जाना भी जरूरी है । यह एक बेहतर शुरुवात भी कही जा सकती है। एक लम्बे अरसे से पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर बहस की बात उठती रही है मगर व्यवहार में यह अब तक संभव नहीं हो सका है । वर्तमान परिदृश्य में अब इसकी सख्त जरूरत महसूस की जाने लगी है । अगर राहुल वास्तव में अपनी पार्टी में ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित रूप से यह कॉंग्रेस के लिए संजीवनी की तरह होगी साथ ही अन्य पार्टियों पर भी इसका प्रभाव देखने मिलेगा और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक कदम होगा । 


जीवेश प्रभाकर

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

दिल्ली के आगे हिन्दोस्तां और भी है.....


पिछले 2-3 हफ्तों से दिल्ली की राजनीति को लेकर जो अंतहीन, अर्थहीन और तर्कहीन बहस चल रही है और इसके पहले भी लगातार कई मुद्दे जो चैनलों पर उठाए जाते रहे हैं वो तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया की सार्थकता पर कई प्रश्न चिन्ह लगाते हैं । क्या दिल्ली ही देश है?? यह बात साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि इस बहुभाषी , बहुसंस्कृति और बहुराष्ट्रीय देश में अपनी अपनी सोच और मुद्दे हैं जो उस क्षेत्रविशेष की दिशा तय करते हैं। हां राष्ट्रीय मुद्दे एक हो सकते हैं और उस पर सोच व दिशा भी एक हो सकती है मगर इस परिप्रेक्ष्य में यदि आप राष्ट्रीय चैनल होने का दावा करते हैं तो आपके मुद्दे संकुचित न होकर  व्यापक होने चाहिए साथ ही आपके बहस का फलक विस्तृत होना चाहिए । मैने आज तक किसी भी तथकथित राष्ट्रीय मुद्दों पर दक्षिण, पश्चिम या पूरब का मत नहीं सुना । क्या सिर्फ दिल्ली वालों की राय ही अंतिम ,सर्वमान्य,सर्वस्वीकार्य और पूरे देश की राय मानी जानी चाहिए ?
इसके पहले भी पिछले कई दिनो से या कहें कई वर्षों से दिल्ली का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राष्ट्रीय होने के नाम पर एक ऊब और वितृष्णा पैदा करने लगा है । जब से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगाज़ हुआ है तब से तो हद ही हो गई है । सुबह से लेकर रात 12 बजे तक हर आधे घंटे में खबरें ...तेज खबरें और सुपर फास्ट खबरें आती हैं मगर इस आधे घंटे में 10 मिनट में जो खबरों के नाम पर परोसा जाता है वो सिवाय दिल्ली , गाजियाबाद,गुड़गांव, नोएडा या ज्यादा हुआ तो यू पी..बस इसके आगे तथाकथित राष्ष्ट्रीय मीडिया के राष्ट्र की सीमा बढ़ ही नहीं पाती । अरे भई हम गैर दिल्लीवासी भी देश का ही हिस्सा हैं । दिल्ली के आगे हिन्दोस्तॉं और भी है........
      दिल्ली में दो वाहन की टक्कर एक राष्ट्रीय खबर है मगर मिजोरम में पांचवीं बार सरकार बनाना नीचे पट्टी पर चलने से ज्यादा जगह नहीं बना पाता । तलवार दंपत्ति राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है मगर बस्तर में मारे जा रहे निरीह आदिवासियों पर कोई बात नहीं होती। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं ।
            एक राष्ट्रीय चैनल के पास उपलब्ध 24 घंटों में से 24 मिनट भी देश के अन्य राज्यों के मुद्दों को देने के लिए नहीं हैं। इन चैनलों पर बाकी राज्य तभी थोड़ी बहुत जगह पाते हैं जब वहां कोई आतंकी धमाका, भयंकर हादसा हो या कोई सैक्स या आर्थिक स्कैण्डल ।
      ये कहा जा सकता है कि लोग ये सब देखने को बाध्य नहीं हैं क्योंकि सबके हाथ में रीमोट है मगर बात सरोकार और जिम्मेदारियों की है । जब मीडिया राष्ट्रीय सरोकार और चौथे स्तंभ का दंभ भरता है तो इसे इसका दायित्व भी समझना होगा। आप इससे किसी भी बहाने से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं ।
इधर प्रस्तावित नए नियमों के तहत 1 घंटे में 12 मिनट की विज्ञापन सीमा तय की गई है मगर हो रहा है उल्टा, तमाम चैनल एक घंटे में 12 मिनट कार्यक्रम दिखाते हैं और बाकी के 48 मिनट विज्ञापन ।  जब जब भी खबरिया चैनलों पर दिखाए जा रहे विज्ञापनो के अधिनियम लागू करने की बात चलती है इसे हर बार 6-6 माह के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है । आखिर क्यों मीडिया तमाम नियम कायदों से खुद को अलग व विशिष्ट करने में अपनी शान समझता है । लोकपाल की सभी बहसों में मीडिया को शामिल करने की चर्चा हंसा मजाक में तबदील कर दी जाती है । आखिर पूरा मीडिया सरकार पोषित ही तो है । 
अब यदि आप  इन राष्ट्रीय चैनलों से दूर रहने की सोचें तो  विडंबना ये है कि क्षेत्रीय चैनल भी इसी ढर्रे पर चल रहे हैं ...वहां भी क्षेत्रीय से ज्यादा दिल्ली की खबरें हैं....आखिर लोग न्यूज चैनलों से भागकर कहां जाएं ....कुछ लोग खेल और मनोरंजन में ठिया बनाने लगे हैं ..... यह एक बेहतर विकल्प हो सकता है... आप भी आमंत्रित हैं ..।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

सरकार की आहट
जीवेश प्रभाकर
      बस एक रात का फासला है और कल सारे अनुमानसारे सर्वेक्षण और सट्टे बाजों के भी आंकलन का परिणाम सामने होगा ।  इस बार मतदाताओं ने अपनेर् कत्तव्य निर्वाहन में काफी उत्साह दिखाया है । देश के अन्य 5 रायों में  चुनाव के नतीजे आयेंगे । मगर ज्यादा उत्सुकता व इंतजार अपने अपने प्रदेश को लेकर ही होता है । निश्चित रूप से इस चुनाव में मुकाबला बहुत ही संघर्षपूर्ण व कांटे का है । तमाम आंकलन व अनुमान लगाए जा चुके हैं और अब वास्तविक नतीजे की घड़ी आ चुकी है । धीमे धीमे करीब आने लगी है सरकार की आहट।
      ये रात सबके लिये बड़ी तनावग्रस्त है । वो जो वातानुकुलित कमरों में चैन की नींद सोते हैंइस रात को वे नहीं सो पाते । जो नतीजों के इंतजार में जागते हैं वो तो इससे निजात नहीं पा सक तेमगर कई ऐसे हैं जिनकी आगे की नींद इन परिणामों पर ही निर्भर करती है । ये वे लोग होते हैं जो सरकार पोषित होते हैं । इनका सब कुछ इन परिणामों पर ही निर्भर होता है । ये आज भी सत्ता से लाभ उठा रहे हैं और आगे भी उठाने की जुगत में लगे रहेंगे । इन लोगों के लिये भी आज की रात कत्ल की रात की तरह होती है । ये वे होते हैं जो चुनाव के दौरान अपनी कोई राय नहीं देते बल्कि दूसरों से राय जानने में लगे रहते हैं । इस दौरान ये बड़े समावेशी , मिलनसार और मृदुभाषी हो जाते हैं ।
      कल आने वाले परिणामों से जाने कितनो के गणित गलत हो जायेंगेगड़बड़ा जायेंगेतो जाने कितनो की केमिस्ट्री फिट हो जायेगी । कितने ही इतिहास में चले जायेंगे तो कितनों के नए अध्याय शुरू होंगे । बस एक रात और सारे समीकरण सामने होंगे । इन तमाम तनावों और उहापोह के बीच चैन से सोता मिलेगा वही जिसे पूरे चुनाव के दौरान ईश्वर की तरह चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा और जो इन सब चढ़ावों कोसबके चढ़ावों को खुले दिल से चढ़ाता हुआ अपनी मर्जी इ.वी.एम. में दर्ज करा आया है । आज की रात वो बड़े आराम से सो रहा है क्योंकि कल के जश्न में उसे ही अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है । यह ईश्वर आज की रात बड़े आराम से खुर्राटे भर रहा होगा ।
      वो फूल वालामिठाईवालापटाखे वालाबैंडवाला .. सब तैयार हैं । उन्हें तो बस बजाना हैजीत किसी की भी हो । ये पूरी तरह नई सरकार की तैयारी में अपना योगदान देने बेचैन हैं । ये हर चुनीव में जश्न के सामान होते हैं । जीतने का जश्न खत्म होते ही विजयी प्रत्याशी फर्श से अर्श तक पहुंच जाता हैअगले चुनाव के आते आते विजेताओं की संपत्ति तो 5-10 गुना बढ़ जाती है मगर ये जो इनकी सवारी निकालते हैं कहीं और नीचे धंसते चले जाते हैं । जाने कितने विजय जूलुसों की शान और योगदान के बावजूद आज भी ये वहीं है । उम्मीद और उत्साह से भरी जनता भी अपने कंघों पर इन विजेताओं को सत्ता की दहलीज पर छोड़ती है जहाँ वे भीतर घुसकर जो किवाड़ बंद करते हैं तो फिर ये झरोखों पर ही दर्शन देते हैं । बाद में हम आप इनके दर्शन तक को तरसते रहते हैं। सुरक्षा के नाम पर हथियारबंद कमांडो से ये अपने आप को इतना सुरक्षित कर लेते हैं कि आमजन इनकी छाया तक भी नहीं पहुंच पाता ।  कल तक जो आपके दरवाजे पर हाथ जोड़े खड़े थे ,कल शाम के बाद इनके सुरक्षाकर्मी अपने हाथो से आपको धकियाते मिलेंगे ।
कल परिणाम आने के बाद सभी आपको यही कहते मिलेंगे, ''देखामैंने तो पहले ही कहा था ... ।''  आप ये सुनने के लिये तैयार रहें ।
       अरे मीडिया को तो भूल ही गए ...सबसे वेसब्र तो यही रहता है । बेसब्र इतना कि चुनाव नतीजों के पहले कागजी सरकार बनवा देते हैं और उस पर बहस भी करवा लेते है । ये  सब ओर से फायदे में होता है । सरकार किसी की बनेजीते कोई भी जश्न तो इसे ही मनाना है । चित भी मेरी पट भी मेरी और अंटा भी जेब में । कल  बधाइयोंधन्यवाद से भरे विज्ञापनों के बीच अखबारों में कोई जगह नहीं होगी ।
     चुनाव आयोग इस बार चुनाव नतीजों के बाद भी प्रत्याशी के  खर्च पर निगाह रखेगा । जश्न का खर्च भी प्रत्याशी के खाते में डाला जाएगा । ये क्या बात हुई । चुनाव खतम पैसा हजम । क्या हर प्रत्याशी अपने निर्धारति राशि में से जश्न के लिए पैसा बचाकर रखे । अरे भई क्या हर प्रत्याशी जीत रहा है ? चुनाव आयोग भी बेतुके फरमानो से अपनी छवि खराब करता रहता है । ये बेलगाम नौकरशाही का एक हास्यासपद नमूना है । कानून तो चुनाव में हुए खर्च के लिए है क्या ....
     अब आपसे नई सरकार के गठन के बाद ही बात होगी। तो मिलते हैं नतीजों के बाद.. ।



शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013


संघर्ष के पर्याय

नेल्सन मण्डेला
1918-2013


 सेनानी को सलाम



संग्राम अभी भी जारी है........................ 

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

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अकार का नया अंक-36 अब नेट पर...
पढ़ेंः--
राजकुमार राकेश का आलेखः
ऊगो चावेस और बोलीवारियन क्रान्ति

हमारे समय में शावेज़ एकमात्र ऐसे राजनयिक थे जिन्होंने प्रत्येक स्तर पर खुले रूप से अमेरिका की गतिविधियों को भर्त्सना की थी । उनकी जगह फिलहाल खाली है । यह लेख शावेज़ के जीवन व्यक्तित्व और विचारों के अनेक पक्षों पर रोशनी डालता है । शावेज़ की मृत्यु के तत्काल बाद हम इसे देना चाहते थे, पर इसकी सामग्री जुटाना और फिर लिखना श्रमसाध्य काम था । राजकुमार राकेश ने अध्ययन और तत्परता के साथ इस ज़रूरी लेख को 'अकार' के लिये तैयार किया इसके लिये हम उनके आभारी हैं ।
- प्रियंवद

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शनिवार, 30 नवंबर 2013

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अकार ( वर्तमान अंक-36 )
अकार -36 अब इंटरनेट पर अपलोड--

मुस्लिम रैनेसॉं पर बातचीत की श्रखला -

      'अकार' ने मुस्लिम समाज, धर्म, इतिहास, के प्रख्यात अध्येताओं से बातचीत की एक श्रृंखला शुरू की है । इसमें सबसे पहले प्रो. इरफान हबीब से की गयी विस्तृत विचारोत्तेजक बातचीत प्रस्तुत की जा रही है। उसके बाद प्रो. शम्सुर्रहमान फारूकी, प्रो. शमीम हनफी और पाकिस्तान के कुछ विशिष्ट लोग होंगे । यदि यह बातचीत, बहस आगे बढ़ी तो हम इसे विश्व के अलग अलग हिस्सों में ले जाने का प्रयास करेंगे ।........
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