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गुरुवार, 1 मई 2014

मजदूर दिवस पर.......



शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

क्रोनी कैपेटेलिस्म या लम्पट पूंजीवादः शब्दों की बाजीगरी से पूंजीवाद को बचाए रखने की कोशिश - -जीवेश प्रभाकर

क्रोनी कैपेटेलिस्म  शब्द आजकल खूब चर्चा में लाया जा रहा है ।हिन्दी में इसे लंपट पूंजीवाद कहा जाने लगा है । जो भी हो हमें इस शब्द  का प्रचार या कहें इस्तेमाल भी बंद करना होगा। सहज, सरल, ग्राह्य, उदार और सर्वोपयोगी  के नाम पर लच्छेदार शब्दावली का उपयोग करते हुए पूंजीवाद को जनता के सामने बेहतर और एकमात्र विकल्प साबित करने के उद्देश्य से इस शब्द को जानबूझकर फैलाने और इस पर बहस की जबरिया कोशिश की जा रही है । देश में विगत 20 वर्षों से जारी अपने प्रयोगों की असफलता से घबराई विश्व पूंजी पॉपुलर टर्मिलॉलॉजी के जरिए पूंजीवाद  को नए सिरे से  स्थापित  करने के  कुत्सित प्रयास में लग गई हैं । इस प्रयास में तमाम बुर्जुआ पार्टियां एकजुट होकर पिल पड़ी हैं। यह समझाने और मनवाने का प्रयास किया जा रहा है कि साहब देश की समस्याओं का हल सिर्फ और सिर्फ पूंजीवाद से ही संभव है हां इसमें लम्पट तत्वों को फिलहाल दूर रखा जा सकता है । इस बात को देश के उद्योगपतियों के सम्मेलन में बड़ी सफाई और चतुराई से उछाला जाता है और फिर सारा कॉर्पोरेट पोषित मीडिया इसके प्रचार में लग जाता है। आज देश में फैले कालेधन और अराजक पूंजी के बोलबाले से युवा वर्ग भौंचक और भ्रमित है । हमें यह समझना होगा कि पूंजीवाद के गर्भ से क्रोनी कैपेटेलिस्म की ही उत्पत्ति संभव हो सकती है। एक बात सीधी तौर पर समझी जानी चाहिए कि बोयेंगे पूंजीवाद तो लंपट ही फलेंगें ।
हम जानते हैं कि पिछले 2 दशक में नवउदार नीतियों और पूंजीवादी प्रयोगों का दौर तेजी से चला । भारत में तो फिर भी इसने 2 दशक पहले ही अपने पैर पसारने शुरु किए मगर शेष विश्व में इसके भी 2 दशक पहले से इसकी कवायद शुरु हो चुकी थी । आज पूरे विश्व में इन नीतियों की असफलता और घातक परिणामों के चलते इसके विरुद्ध आवाज बुलंद है । आज पूंजीवादी ताकतों के सामने अपना अस्तितव कायम रखने की गंभीर चुनौती आ खड़ी हुई है । अधिकतर यूरोपीय, लेटिन अमरीकी देशों के साथ साथ अमरीका में भी पूंजीवाद गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है । हमारे देश में भी एक बहुत बड़ा वर्ग इन नीतियों की विफलता और दुष्परिणामों की आहट से भयभीत होने लगा है , खासकर वो युवा वर्ग जिसने विगत वर्षों में विश्वव्यापी मंदी में अपनी जमीन खसकते देखी है । इस बात का अंदेशा राजनैतिक पार्टियों को भी हो चुका है और इसीलिए वे पूंजीवाद के मेकओव्हर में लग गई हैं । क्रोनी कैपेटेलिस्म की चर्चा इन्हीं प्रयासों का एक हिस्सा है । ये तो वही बात हुई कि साहब कातिल और डाकू नहीं चलेंगे मगर उठाईगीर से क्या परहेज। अपनी लच्छेदार बयानबाजी और वाकपटुता से ये जनता को लुभाना चाहते हैं  हमें इन मक्कारों के शब्दजाल से बचना होगा और इनकी कुटिल चालों को समझना होगा । 
9वें दशक के अंतिम वर्षों में जब सोवियत संघ टूटा तो पूरे पूंजीवादी देशों ने अपनी सफलता का जश्न बड़े धूमधाम से मनाया था । एक बात गौर करने वाली है कि जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो पूंजीवादी ताकतों का अनुमान था कि भारत भी इससे अछूता न रहेगा मगर उस वक्त भारत में इसका प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ा और वाम दल सशक्त होकर उभरे । भारत में तब वामपंथी पार्टियों  और दक्षिण पंथी पार्टी भाजपा के सहयोग से व्ही. पी. सिंह की सरकार बनी हालांकि वो ज्यादा दिन नहीं चल सकी ।इसके बाद चंद्रशेखर की सरकार भी गिरा दी गई, फिर हुए मध्यावधि चुनाव में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई । चुनाव में हालांकि कॉंग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला मगर वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और नरसिंम्हा राव प्रधान मंत्री बने तथा वर्तमान प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पहली बार वित्त मंत्री बनाए गए ।  ये देश के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ । बस इसके बाद देश में नवउदार और बाजारवाद ने तेजी से पैर पसारने शुरु किए ।
इन सबके वावजूद वामपंथी सोच देश में अपना अस्तित्व कायम रखने में कामयाब हो रही थी हालांकि इसका प्रभाव काफी सीमित रहा मगर नवउदार और बाजार की ताकतें इसे पूरी तरह समाप्त करने के अपने पूर्व संकल्प पर दृढ़ थी और हैं अतः उस वक्त इन ताकतों ने एनजीओकरण का खतरनाक खेल खेला जिसने सबसे पहले और सबसे ज्यादा वामपंथी कॉडर तो समाहित किया गया । हालांकि एनजीओकरण की प्रक्रिया इसके भी काफी पहले से चल रही थी मगर इतनी व्यापक और सुलभ नहीं थी। विश्व बैंक और आईएमएफ के साथ मिलकर दिए जा रहे कर्जों की शर्तों में एनजीओ की भागेदारी सुनिश्चित करवाई गई । इस एनजीओकरण का सबसे बड़ा खामियाजा वाम दलों को भुगतना पड़ा जिनका एक बड़ा वर्ग इसकी भेंट चढ़ गया । बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हालांकि एक बार ऐसा मौका आया था जब वामपंथियों को केन्द्र में सरकार बनाने का मौका मिला मगर हमेशा की तरह ऐतिहासिक भूल करते हुए उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए । ये वामपंथ के लिए तो कम मगर देश के लिए काफी नुकसानदायी साबित हुआ।  गौर करने वाली बात ये है कि इसके साथ साथ कश्मीर में आतंकवाद और देश में कट्टरपंथी ताकतों का उभार भी उसी तेजी से हुआ । शायद इसलिए कि नौजवानो का ध्यान पूंजीवाद के इस फैलाव और इसके दुष्परिणामों की ओर न जा पाए ।         

आज जब पूंजीवादी ताकतें नई नई शब्दावली और विभिन्न दांवपेंचों के जरिए एकजुट होकर अपना वर्चस्व बचाने में लगी हुई हैं हमें सावधान रहने की जरूरत है । आज कॉर्पोरेट पोषित मीडिया से पूरा जनपक्ष या कहें वामपंथी सोच रखने वाली पार्टियां गायब कर दी गई हैं । इस षड़यंत्र के तहत चे प्रचारित किया जा रहा है कि वामपंथ अब हाशिए से भी बाहर है । हालांकि इस स्थिति के लिए वामदल भी उतने ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वे आमजन से काफी दूर जा चुके हैं और अपना जन आंदोलन की प्रवृत्ति से भटककर कमरों और कैमरों में कैद हो गए हैं। फिर भी आमजन में वाम पक्ष को लेकर उम्मीदें अभी जिंदा हैं जो विकल्प के रूप में उनकी महती भूमिका के इंतजार में हैं ।  

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

अकार का नया अंक

अकार का नया अंक नेट पर...

नई सदी के कथाकारों की पहली पीढ़ी पर केन्द्रित अंक

अकार 37

 
"पुनर्वास बस्तियों में लिखी जा रही साहित्य की नई इबारत.."


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के अनतर्गत अकार वर्तमान अंक में पढें....


















जीवेश प्रभाकर
(उप संपादक)

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

राहुल गांधी के बहाने

राहुल गांधी के बहाने
जीवेश प्रभाकर

लोकसभा की आहट के साथ ही कॉंग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का देश के विभन्न क्षेत्रों में दौरा किया जा रहा है ।एक नए तेवर और योजना के साथ वे जगह जगह चौपाल लगा रहे हैं और अपने कार्यकर्ताओं से रूबरू भी हो रहे हैं । हालांकि काफी देर से इसे शुरु किया गया मगर यह काफी कारगर साबित हो सकता है । उल्लेखनीय है कि हाल ही में राहुल गांधी ने लगभग एक दशक के पश्चात एक साक्षात्कार दिया था । यह साक्षात्कार काफी चर्चा में है । देखा जाए तो यह मोदी के लिए एक चुनौती भी है मगर इसे इस रूप में देखने की बजाय यदि ये कहा जाए कि इस साक्षात्कार से राहुल एक नए रूप में सामने आए हैं तो गलत नहीं होगा । कुछ विवादित मुद्दों पर उनके जवाब से बवाल जरूर मचा हुआ है मगर आज की राजनीति में ऐसे विवाद ही चर्चा में रखते हैं । राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है चाहे उससे विवाद ही क्यों न हो मगर जनता से जुड़ने का यह सबसे बेहतर माध्यम है ।
विगत दिनो संपन्न विधानसभा चुनावों में पूरे देश में कॉंग्रेस की भद पिटी , सिर्फ छत्तीसगढ़ में उनकी साख में कुछ इजाफा हुआ । हालांकि सीटों के लिहाज से कोई फायदा नहीं हुआ मगर भाजपा और कॉंग्रेस में वोट प्रतिशत  का अंतर मात्र 0.7 % रहा जिससे कॉंग्रेस को छत्तीसगढ़ में  आगामी लोकसभा के लिए कुछ उम्मीद नजर आने लगी।  इस  बार के आम चुनाव कॉंग्रेस के लिए काफी मुश्किल भरे होंगे इसकी संभावना ज्यादा है । विगत 10 वर्षों से केन्द्र में सत्तारूढ़ कॉंग्रेस से आम जनता की उम्मीदें टूट चुकी हैं और वो एक नए विकल्प की तलाश में है । हालांकि ऐसा कोई निश्चित और सशक्त विकल्प अब तक जनता के सामने नहीं उभरा है । दिल्ली में सरकार बनाने के पश्चात एक बड़े तबके द्वारा आम आदमी पार्टी से भी काफी उम्मीदें की जाने लगी हैं । निश्चित रूप से विकल्पहीनता से जूझते आम जन के पास नए विकल्प को आजमाने की संभावनाएं जरूर बनती हैं। नरेन्द्र मोदी को आगे कर भाजपा ने अपनी चुनौती पेश की है हालांकि आम जन अभी तक इससे इत्तेफाक रखता दिख नहीं रहा है मगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार का ग्राफ जिस तेजी से नीचे की ओर जा रहा है उसके चलते बनती उम्मीदों के टूटने का भय होता जा रहा है । यदि कॉंगेस अपनी गिरती साख बचाने में नाकामयाब रही तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा ।  देखा जाए तो यह चुनाव भाजपा के लिए भी सबसे निर्णायक कहा जा सकता है । भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के रूप में अपना ब्रहमास्त्र चला दिया है । अगर इस बार के आम चुनाव में मोदी को आशातीत सफलता न मिली तो भाजपा एक लम्बे समय के लिए हाशिए पर जा सकती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता । वहीं दूसरी ओर राहुल को इस चुनाव में प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित न किया जाना कॉंग्रेस की सबसे चतुर रणनीति का परिचायक है । ये सभी जानते हैं कि यदि कॉंग्रेस किसी तौर सरकार बनाने के करीब पहुंच पाई तो निःसंदेह राहुल ही प्रधानमंत्री होंगे ,मगर यदि भाजपा सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत के जरा ज्यादा दूर रह जाती है तो अन्य दलों के समर्थन के लिए संभवतः मोदी को बलि का बकरा बनने से नहीं रोका जा सकता ।
   
आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पूरे देश में कॉंग्रेस के लिए कोई उम्मीद अगर बचती है तो वो सिर्फ बेहतर और सक्षम प्रत्याशी का चयन ही है । राहुल गांधी पूरे देश में कॉंग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की वकालत करते फिर रहे हैं । साथ ही वे आम आदमी पार्टी का ही फंडा लेकर आम जन से रायशुमारी के भी तमाम हथकंडे अपना रहे हैं जिससे कुछ राहत जरूर मिल सकती है मगर इसे व्यवहार में अमल किया जाना भी जरूरी है । यह एक बेहतर शुरुवात भी कही जा सकती है। एक लम्बे अरसे से पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर बहस की बात उठती रही है मगर व्यवहार में यह अब तक संभव नहीं हो सका है । वर्तमान परिदृश्य में अब इसकी सख्त जरूरत महसूस की जाने लगी है । अगर राहुल वास्तव में अपनी पार्टी में ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित रूप से यह कॉंग्रेस के लिए संजीवनी की तरह होगी साथ ही अन्य पार्टियों पर भी इसका प्रभाव देखने मिलेगा और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक कदम होगा । 


जीवेश प्रभाकर

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

दिल्ली के आगे हिन्दोस्तां और भी है.....


पिछले 2-3 हफ्तों से दिल्ली की राजनीति को लेकर जो अंतहीन, अर्थहीन और तर्कहीन बहस चल रही है और इसके पहले भी लगातार कई मुद्दे जो चैनलों पर उठाए जाते रहे हैं वो तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया की सार्थकता पर कई प्रश्न चिन्ह लगाते हैं । क्या दिल्ली ही देश है?? यह बात साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि इस बहुभाषी , बहुसंस्कृति और बहुराष्ट्रीय देश में अपनी अपनी सोच और मुद्दे हैं जो उस क्षेत्रविशेष की दिशा तय करते हैं। हां राष्ट्रीय मुद्दे एक हो सकते हैं और उस पर सोच व दिशा भी एक हो सकती है मगर इस परिप्रेक्ष्य में यदि आप राष्ट्रीय चैनल होने का दावा करते हैं तो आपके मुद्दे संकुचित न होकर  व्यापक होने चाहिए साथ ही आपके बहस का फलक विस्तृत होना चाहिए । मैने आज तक किसी भी तथकथित राष्ट्रीय मुद्दों पर दक्षिण, पश्चिम या पूरब का मत नहीं सुना । क्या सिर्फ दिल्ली वालों की राय ही अंतिम ,सर्वमान्य,सर्वस्वीकार्य और पूरे देश की राय मानी जानी चाहिए ?
इसके पहले भी पिछले कई दिनो से या कहें कई वर्षों से दिल्ली का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राष्ट्रीय होने के नाम पर एक ऊब और वितृष्णा पैदा करने लगा है । जब से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का आगाज़ हुआ है तब से तो हद ही हो गई है । सुबह से लेकर रात 12 बजे तक हर आधे घंटे में खबरें ...तेज खबरें और सुपर फास्ट खबरें आती हैं मगर इस आधे घंटे में 10 मिनट में जो खबरों के नाम पर परोसा जाता है वो सिवाय दिल्ली , गाजियाबाद,गुड़गांव, नोएडा या ज्यादा हुआ तो यू पी..बस इसके आगे तथाकथित राष्ष्ट्रीय मीडिया के राष्ट्र की सीमा बढ़ ही नहीं पाती । अरे भई हम गैर दिल्लीवासी भी देश का ही हिस्सा हैं । दिल्ली के आगे हिन्दोस्तॉं और भी है........
      दिल्ली में दो वाहन की टक्कर एक राष्ट्रीय खबर है मगर मिजोरम में पांचवीं बार सरकार बनाना नीचे पट्टी पर चलने से ज्यादा जगह नहीं बना पाता । तलवार दंपत्ति राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है मगर बस्तर में मारे जा रहे निरीह आदिवासियों पर कोई बात नहीं होती। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं ।
            एक राष्ट्रीय चैनल के पास उपलब्ध 24 घंटों में से 24 मिनट भी देश के अन्य राज्यों के मुद्दों को देने के लिए नहीं हैं। इन चैनलों पर बाकी राज्य तभी थोड़ी बहुत जगह पाते हैं जब वहां कोई आतंकी धमाका, भयंकर हादसा हो या कोई सैक्स या आर्थिक स्कैण्डल ।
      ये कहा जा सकता है कि लोग ये सब देखने को बाध्य नहीं हैं क्योंकि सबके हाथ में रीमोट है मगर बात सरोकार और जिम्मेदारियों की है । जब मीडिया राष्ट्रीय सरोकार और चौथे स्तंभ का दंभ भरता है तो इसे इसका दायित्व भी समझना होगा। आप इससे किसी भी बहाने से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं ।
इधर प्रस्तावित नए नियमों के तहत 1 घंटे में 12 मिनट की विज्ञापन सीमा तय की गई है मगर हो रहा है उल्टा, तमाम चैनल एक घंटे में 12 मिनट कार्यक्रम दिखाते हैं और बाकी के 48 मिनट विज्ञापन ।  जब जब भी खबरिया चैनलों पर दिखाए जा रहे विज्ञापनो के अधिनियम लागू करने की बात चलती है इसे हर बार 6-6 माह के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है । आखिर क्यों मीडिया तमाम नियम कायदों से खुद को अलग व विशिष्ट करने में अपनी शान समझता है । लोकपाल की सभी बहसों में मीडिया को शामिल करने की चर्चा हंसा मजाक में तबदील कर दी जाती है । आखिर पूरा मीडिया सरकार पोषित ही तो है । 
अब यदि आप  इन राष्ट्रीय चैनलों से दूर रहने की सोचें तो  विडंबना ये है कि क्षेत्रीय चैनल भी इसी ढर्रे पर चल रहे हैं ...वहां भी क्षेत्रीय से ज्यादा दिल्ली की खबरें हैं....आखिर लोग न्यूज चैनलों से भागकर कहां जाएं ....कुछ लोग खेल और मनोरंजन में ठिया बनाने लगे हैं ..... यह एक बेहतर विकल्प हो सकता है... आप भी आमंत्रित हैं ..।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

सरकार की आहट
जीवेश प्रभाकर
      बस एक रात का फासला है और कल सारे अनुमानसारे सर्वेक्षण और सट्टे बाजों के भी आंकलन का परिणाम सामने होगा ।  इस बार मतदाताओं ने अपनेर् कत्तव्य निर्वाहन में काफी उत्साह दिखाया है । देश के अन्य 5 रायों में  चुनाव के नतीजे आयेंगे । मगर ज्यादा उत्सुकता व इंतजार अपने अपने प्रदेश को लेकर ही होता है । निश्चित रूप से इस चुनाव में मुकाबला बहुत ही संघर्षपूर्ण व कांटे का है । तमाम आंकलन व अनुमान लगाए जा चुके हैं और अब वास्तविक नतीजे की घड़ी आ चुकी है । धीमे धीमे करीब आने लगी है सरकार की आहट।
      ये रात सबके लिये बड़ी तनावग्रस्त है । वो जो वातानुकुलित कमरों में चैन की नींद सोते हैंइस रात को वे नहीं सो पाते । जो नतीजों के इंतजार में जागते हैं वो तो इससे निजात नहीं पा सक तेमगर कई ऐसे हैं जिनकी आगे की नींद इन परिणामों पर ही निर्भर करती है । ये वे लोग होते हैं जो सरकार पोषित होते हैं । इनका सब कुछ इन परिणामों पर ही निर्भर होता है । ये आज भी सत्ता से लाभ उठा रहे हैं और आगे भी उठाने की जुगत में लगे रहेंगे । इन लोगों के लिये भी आज की रात कत्ल की रात की तरह होती है । ये वे होते हैं जो चुनाव के दौरान अपनी कोई राय नहीं देते बल्कि दूसरों से राय जानने में लगे रहते हैं । इस दौरान ये बड़े समावेशी , मिलनसार और मृदुभाषी हो जाते हैं ।
      कल आने वाले परिणामों से जाने कितनो के गणित गलत हो जायेंगेगड़बड़ा जायेंगेतो जाने कितनो की केमिस्ट्री फिट हो जायेगी । कितने ही इतिहास में चले जायेंगे तो कितनों के नए अध्याय शुरू होंगे । बस एक रात और सारे समीकरण सामने होंगे । इन तमाम तनावों और उहापोह के बीच चैन से सोता मिलेगा वही जिसे पूरे चुनाव के दौरान ईश्वर की तरह चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा और जो इन सब चढ़ावों कोसबके चढ़ावों को खुले दिल से चढ़ाता हुआ अपनी मर्जी इ.वी.एम. में दर्ज करा आया है । आज की रात वो बड़े आराम से सो रहा है क्योंकि कल के जश्न में उसे ही अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है । यह ईश्वर आज की रात बड़े आराम से खुर्राटे भर रहा होगा ।
      वो फूल वालामिठाईवालापटाखे वालाबैंडवाला .. सब तैयार हैं । उन्हें तो बस बजाना हैजीत किसी की भी हो । ये पूरी तरह नई सरकार की तैयारी में अपना योगदान देने बेचैन हैं । ये हर चुनीव में जश्न के सामान होते हैं । जीतने का जश्न खत्म होते ही विजयी प्रत्याशी फर्श से अर्श तक पहुंच जाता हैअगले चुनाव के आते आते विजेताओं की संपत्ति तो 5-10 गुना बढ़ जाती है मगर ये जो इनकी सवारी निकालते हैं कहीं और नीचे धंसते चले जाते हैं । जाने कितने विजय जूलुसों की शान और योगदान के बावजूद आज भी ये वहीं है । उम्मीद और उत्साह से भरी जनता भी अपने कंघों पर इन विजेताओं को सत्ता की दहलीज पर छोड़ती है जहाँ वे भीतर घुसकर जो किवाड़ बंद करते हैं तो फिर ये झरोखों पर ही दर्शन देते हैं । बाद में हम आप इनके दर्शन तक को तरसते रहते हैं। सुरक्षा के नाम पर हथियारबंद कमांडो से ये अपने आप को इतना सुरक्षित कर लेते हैं कि आमजन इनकी छाया तक भी नहीं पहुंच पाता ।  कल तक जो आपके दरवाजे पर हाथ जोड़े खड़े थे ,कल शाम के बाद इनके सुरक्षाकर्मी अपने हाथो से आपको धकियाते मिलेंगे ।
कल परिणाम आने के बाद सभी आपको यही कहते मिलेंगे, ''देखामैंने तो पहले ही कहा था ... ।''  आप ये सुनने के लिये तैयार रहें ।
       अरे मीडिया को तो भूल ही गए ...सबसे वेसब्र तो यही रहता है । बेसब्र इतना कि चुनाव नतीजों के पहले कागजी सरकार बनवा देते हैं और उस पर बहस भी करवा लेते है । ये  सब ओर से फायदे में होता है । सरकार किसी की बनेजीते कोई भी जश्न तो इसे ही मनाना है । चित भी मेरी पट भी मेरी और अंटा भी जेब में । कल  बधाइयोंधन्यवाद से भरे विज्ञापनों के बीच अखबारों में कोई जगह नहीं होगी ।
     चुनाव आयोग इस बार चुनाव नतीजों के बाद भी प्रत्याशी के  खर्च पर निगाह रखेगा । जश्न का खर्च भी प्रत्याशी के खाते में डाला जाएगा । ये क्या बात हुई । चुनाव खतम पैसा हजम । क्या हर प्रत्याशी अपने निर्धारति राशि में से जश्न के लिए पैसा बचाकर रखे । अरे भई क्या हर प्रत्याशी जीत रहा है ? चुनाव आयोग भी बेतुके फरमानो से अपनी छवि खराब करता रहता है । ये बेलगाम नौकरशाही का एक हास्यासपद नमूना है । कानून तो चुनाव में हुए खर्च के लिए है क्या ....
     अब आपसे नई सरकार के गठन के बाद ही बात होगी। तो मिलते हैं नतीजों के बाद.. ।



शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013


संघर्ष के पर्याय

नेल्सन मण्डेला
1918-2013


 सेनानी को सलाम



संग्राम अभी भी जारी है........................