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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

विकल्प विमर्श में इस हफ्ते......


विकल्प विमर्श में इस हफ्ते......
(दिए गए लिंक पर क्लिक करें..)
आगे पांच साल---प्रभाकर चौबे का लेख
http://www.vikalpvimarsh.in/moreSampadkiya.asp?Details=4715
इज़राइल की बर्बरता के खिलाफ़ आवाज़ उठाना क्यों ज़रूरी है?
http://www.vikalpvimarsh.in/morevimarsh.asp?Details=4719
http://www.vikalpvimarsh.in/morekahani.asp?Details=4717

http://www.vikalpvimarsh.in/morekavita.asp?Details=4720

मंगलवार, 17 जून 2014

अकार क नया अंक- अकार 38

अकार का नया अंक
अकार 38 प्रकाशित हो चुका है ।

आप इसे नेट पर भी पढ़ सकते हैं
जिसकी लिंक नीचे दी गई है ः--

http://sangamankar.com/index.php?option=com_content&view=article&id=226&Itemid=555


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प्रियंवद
15269, सिविल लाईन्सकानपुर - 208  001
फोन न. : 0512-2305561 (नि.) (M) 09839215236
जीवेश प्रभाकर
69/2213, रोहिणीपुरम -2, रायपुर-492001 (छ.ग.)
फोन –09425506574  ई मेल - jeeveshprabhakar@gmail.com   

जीवेश प्रभाकर
(उप संपादक)

शनिवार, 17 मई 2014

गुरुवार, 1 मई 2014

मजदूर दिवस पर.......



शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

क्रोनी कैपेटेलिस्म या लम्पट पूंजीवादः शब्दों की बाजीगरी से पूंजीवाद को बचाए रखने की कोशिश - -जीवेश प्रभाकर

क्रोनी कैपेटेलिस्म  शब्द आजकल खूब चर्चा में लाया जा रहा है ।हिन्दी में इसे लंपट पूंजीवाद कहा जाने लगा है । जो भी हो हमें इस शब्द  का प्रचार या कहें इस्तेमाल भी बंद करना होगा। सहज, सरल, ग्राह्य, उदार और सर्वोपयोगी  के नाम पर लच्छेदार शब्दावली का उपयोग करते हुए पूंजीवाद को जनता के सामने बेहतर और एकमात्र विकल्प साबित करने के उद्देश्य से इस शब्द को जानबूझकर फैलाने और इस पर बहस की जबरिया कोशिश की जा रही है । देश में विगत 20 वर्षों से जारी अपने प्रयोगों की असफलता से घबराई विश्व पूंजी पॉपुलर टर्मिलॉलॉजी के जरिए पूंजीवाद  को नए सिरे से  स्थापित  करने के  कुत्सित प्रयास में लग गई हैं । इस प्रयास में तमाम बुर्जुआ पार्टियां एकजुट होकर पिल पड़ी हैं। यह समझाने और मनवाने का प्रयास किया जा रहा है कि साहब देश की समस्याओं का हल सिर्फ और सिर्फ पूंजीवाद से ही संभव है हां इसमें लम्पट तत्वों को फिलहाल दूर रखा जा सकता है । इस बात को देश के उद्योगपतियों के सम्मेलन में बड़ी सफाई और चतुराई से उछाला जाता है और फिर सारा कॉर्पोरेट पोषित मीडिया इसके प्रचार में लग जाता है। आज देश में फैले कालेधन और अराजक पूंजी के बोलबाले से युवा वर्ग भौंचक और भ्रमित है । हमें यह समझना होगा कि पूंजीवाद के गर्भ से क्रोनी कैपेटेलिस्म की ही उत्पत्ति संभव हो सकती है। एक बात सीधी तौर पर समझी जानी चाहिए कि बोयेंगे पूंजीवाद तो लंपट ही फलेंगें ।
हम जानते हैं कि पिछले 2 दशक में नवउदार नीतियों और पूंजीवादी प्रयोगों का दौर तेजी से चला । भारत में तो फिर भी इसने 2 दशक पहले ही अपने पैर पसारने शुरु किए मगर शेष विश्व में इसके भी 2 दशक पहले से इसकी कवायद शुरु हो चुकी थी । आज पूरे विश्व में इन नीतियों की असफलता और घातक परिणामों के चलते इसके विरुद्ध आवाज बुलंद है । आज पूंजीवादी ताकतों के सामने अपना अस्तितव कायम रखने की गंभीर चुनौती आ खड़ी हुई है । अधिकतर यूरोपीय, लेटिन अमरीकी देशों के साथ साथ अमरीका में भी पूंजीवाद गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है । हमारे देश में भी एक बहुत बड़ा वर्ग इन नीतियों की विफलता और दुष्परिणामों की आहट से भयभीत होने लगा है , खासकर वो युवा वर्ग जिसने विगत वर्षों में विश्वव्यापी मंदी में अपनी जमीन खसकते देखी है । इस बात का अंदेशा राजनैतिक पार्टियों को भी हो चुका है और इसीलिए वे पूंजीवाद के मेकओव्हर में लग गई हैं । क्रोनी कैपेटेलिस्म की चर्चा इन्हीं प्रयासों का एक हिस्सा है । ये तो वही बात हुई कि साहब कातिल और डाकू नहीं चलेंगे मगर उठाईगीर से क्या परहेज। अपनी लच्छेदार बयानबाजी और वाकपटुता से ये जनता को लुभाना चाहते हैं  हमें इन मक्कारों के शब्दजाल से बचना होगा और इनकी कुटिल चालों को समझना होगा । 
9वें दशक के अंतिम वर्षों में जब सोवियत संघ टूटा तो पूरे पूंजीवादी देशों ने अपनी सफलता का जश्न बड़े धूमधाम से मनाया था । एक बात गौर करने वाली है कि जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो पूंजीवादी ताकतों का अनुमान था कि भारत भी इससे अछूता न रहेगा मगर उस वक्त भारत में इसका प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ा और वाम दल सशक्त होकर उभरे । भारत में तब वामपंथी पार्टियों  और दक्षिण पंथी पार्टी भाजपा के सहयोग से व्ही. पी. सिंह की सरकार बनी हालांकि वो ज्यादा दिन नहीं चल सकी ।इसके बाद चंद्रशेखर की सरकार भी गिरा दी गई, फिर हुए मध्यावधि चुनाव में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई । चुनाव में हालांकि कॉंग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला मगर वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और नरसिंम्हा राव प्रधान मंत्री बने तथा वर्तमान प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पहली बार वित्त मंत्री बनाए गए ।  ये देश के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ । बस इसके बाद देश में नवउदार और बाजारवाद ने तेजी से पैर पसारने शुरु किए ।
इन सबके वावजूद वामपंथी सोच देश में अपना अस्तित्व कायम रखने में कामयाब हो रही थी हालांकि इसका प्रभाव काफी सीमित रहा मगर नवउदार और बाजार की ताकतें इसे पूरी तरह समाप्त करने के अपने पूर्व संकल्प पर दृढ़ थी और हैं अतः उस वक्त इन ताकतों ने एनजीओकरण का खतरनाक खेल खेला जिसने सबसे पहले और सबसे ज्यादा वामपंथी कॉडर तो समाहित किया गया । हालांकि एनजीओकरण की प्रक्रिया इसके भी काफी पहले से चल रही थी मगर इतनी व्यापक और सुलभ नहीं थी। विश्व बैंक और आईएमएफ के साथ मिलकर दिए जा रहे कर्जों की शर्तों में एनजीओ की भागेदारी सुनिश्चित करवाई गई । इस एनजीओकरण का सबसे बड़ा खामियाजा वाम दलों को भुगतना पड़ा जिनका एक बड़ा वर्ग इसकी भेंट चढ़ गया । बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हालांकि एक बार ऐसा मौका आया था जब वामपंथियों को केन्द्र में सरकार बनाने का मौका मिला मगर हमेशा की तरह ऐतिहासिक भूल करते हुए उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए । ये वामपंथ के लिए तो कम मगर देश के लिए काफी नुकसानदायी साबित हुआ।  गौर करने वाली बात ये है कि इसके साथ साथ कश्मीर में आतंकवाद और देश में कट्टरपंथी ताकतों का उभार भी उसी तेजी से हुआ । शायद इसलिए कि नौजवानो का ध्यान पूंजीवाद के इस फैलाव और इसके दुष्परिणामों की ओर न जा पाए ।         

आज जब पूंजीवादी ताकतें नई नई शब्दावली और विभिन्न दांवपेंचों के जरिए एकजुट होकर अपना वर्चस्व बचाने में लगी हुई हैं हमें सावधान रहने की जरूरत है । आज कॉर्पोरेट पोषित मीडिया से पूरा जनपक्ष या कहें वामपंथी सोच रखने वाली पार्टियां गायब कर दी गई हैं । इस षड़यंत्र के तहत चे प्रचारित किया जा रहा है कि वामपंथ अब हाशिए से भी बाहर है । हालांकि इस स्थिति के लिए वामदल भी उतने ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वे आमजन से काफी दूर जा चुके हैं और अपना जन आंदोलन की प्रवृत्ति से भटककर कमरों और कैमरों में कैद हो गए हैं। फिर भी आमजन में वाम पक्ष को लेकर उम्मीदें अभी जिंदा हैं जो विकल्प के रूप में उनकी महती भूमिका के इंतजार में हैं ।  

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

अकार का नया अंक

अकार का नया अंक नेट पर...

नई सदी के कथाकारों की पहली पीढ़ी पर केन्द्रित अंक

अकार 37

 
"पुनर्वास बस्तियों में लिखी जा रही साहित्य की नई इबारत.."


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के अनतर्गत अकार वर्तमान अंक में पढें....


















जीवेश प्रभाकर
(उप संपादक)

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

राहुल गांधी के बहाने

राहुल गांधी के बहाने
जीवेश प्रभाकर

लोकसभा की आहट के साथ ही कॉंग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का देश के विभन्न क्षेत्रों में दौरा किया जा रहा है ।एक नए तेवर और योजना के साथ वे जगह जगह चौपाल लगा रहे हैं और अपने कार्यकर्ताओं से रूबरू भी हो रहे हैं । हालांकि काफी देर से इसे शुरु किया गया मगर यह काफी कारगर साबित हो सकता है । उल्लेखनीय है कि हाल ही में राहुल गांधी ने लगभग एक दशक के पश्चात एक साक्षात्कार दिया था । यह साक्षात्कार काफी चर्चा में है । देखा जाए तो यह मोदी के लिए एक चुनौती भी है मगर इसे इस रूप में देखने की बजाय यदि ये कहा जाए कि इस साक्षात्कार से राहुल एक नए रूप में सामने आए हैं तो गलत नहीं होगा । कुछ विवादित मुद्दों पर उनके जवाब से बवाल जरूर मचा हुआ है मगर आज की राजनीति में ऐसे विवाद ही चर्चा में रखते हैं । राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है चाहे उससे विवाद ही क्यों न हो मगर जनता से जुड़ने का यह सबसे बेहतर माध्यम है ।
विगत दिनो संपन्न विधानसभा चुनावों में पूरे देश में कॉंग्रेस की भद पिटी , सिर्फ छत्तीसगढ़ में उनकी साख में कुछ इजाफा हुआ । हालांकि सीटों के लिहाज से कोई फायदा नहीं हुआ मगर भाजपा और कॉंग्रेस में वोट प्रतिशत  का अंतर मात्र 0.7 % रहा जिससे कॉंग्रेस को छत्तीसगढ़ में  आगामी लोकसभा के लिए कुछ उम्मीद नजर आने लगी।  इस  बार के आम चुनाव कॉंग्रेस के लिए काफी मुश्किल भरे होंगे इसकी संभावना ज्यादा है । विगत 10 वर्षों से केन्द्र में सत्तारूढ़ कॉंग्रेस से आम जनता की उम्मीदें टूट चुकी हैं और वो एक नए विकल्प की तलाश में है । हालांकि ऐसा कोई निश्चित और सशक्त विकल्प अब तक जनता के सामने नहीं उभरा है । दिल्ली में सरकार बनाने के पश्चात एक बड़े तबके द्वारा आम आदमी पार्टी से भी काफी उम्मीदें की जाने लगी हैं । निश्चित रूप से विकल्पहीनता से जूझते आम जन के पास नए विकल्प को आजमाने की संभावनाएं जरूर बनती हैं। नरेन्द्र मोदी को आगे कर भाजपा ने अपनी चुनौती पेश की है हालांकि आम जन अभी तक इससे इत्तेफाक रखता दिख नहीं रहा है मगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार का ग्राफ जिस तेजी से नीचे की ओर जा रहा है उसके चलते बनती उम्मीदों के टूटने का भय होता जा रहा है । यदि कॉंगेस अपनी गिरती साख बचाने में नाकामयाब रही तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा ।  देखा जाए तो यह चुनाव भाजपा के लिए भी सबसे निर्णायक कहा जा सकता है । भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के रूप में अपना ब्रहमास्त्र चला दिया है । अगर इस बार के आम चुनाव में मोदी को आशातीत सफलता न मिली तो भाजपा एक लम्बे समय के लिए हाशिए पर जा सकती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता । वहीं दूसरी ओर राहुल को इस चुनाव में प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित न किया जाना कॉंग्रेस की सबसे चतुर रणनीति का परिचायक है । ये सभी जानते हैं कि यदि कॉंग्रेस किसी तौर सरकार बनाने के करीब पहुंच पाई तो निःसंदेह राहुल ही प्रधानमंत्री होंगे ,मगर यदि भाजपा सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत के जरा ज्यादा दूर रह जाती है तो अन्य दलों के समर्थन के लिए संभवतः मोदी को बलि का बकरा बनने से नहीं रोका जा सकता ।
   
आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पूरे देश में कॉंग्रेस के लिए कोई उम्मीद अगर बचती है तो वो सिर्फ बेहतर और सक्षम प्रत्याशी का चयन ही है । राहुल गांधी पूरे देश में कॉंग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की वकालत करते फिर रहे हैं । साथ ही वे आम आदमी पार्टी का ही फंडा लेकर आम जन से रायशुमारी के भी तमाम हथकंडे अपना रहे हैं जिससे कुछ राहत जरूर मिल सकती है मगर इसे व्यवहार में अमल किया जाना भी जरूरी है । यह एक बेहतर शुरुवात भी कही जा सकती है। एक लम्बे अरसे से पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर बहस की बात उठती रही है मगर व्यवहार में यह अब तक संभव नहीं हो सका है । वर्तमान परिदृश्य में अब इसकी सख्त जरूरत महसूस की जाने लगी है । अगर राहुल वास्तव में अपनी पार्टी में ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित रूप से यह कॉंग्रेस के लिए संजीवनी की तरह होगी साथ ही अन्य पार्टियों पर भी इसका प्रभाव देखने मिलेगा और भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक कदम होगा । 


जीवेश प्रभाकर