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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के 11 वर्ष : -जीवेश चौबे

इस दिसम्बर छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के 11 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । लगातार तीसरी बार जीतने का शानदार रिकार्ड बनाकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने देश में अपना नाम व मान बढ़ाया है । प्रदेश गठन के पश्चात हुए पहले स्वतंत्र चुनाव में डॉ. रमन सिंह ने पहली बार 2003 में बहुमत प्राप्त किया था । तब लगभग अजेय समझे जाने वाले कांग्रेस के अजीत जोगी को मात देकर डॉ. रमन सिंह ने पहली बार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का पद संभाला ,तब से लगातार उन्होंने अपनी सौम्य व संयत छवि से प्रदेश के मतदाताओं को अपने मोह से बांधे रखा है। 2008 एवं पिछले वर्ष 2013 दोनों ही चुनावों में तमाम अटकलों को विराम देते हुए उन्हों जीत का परचम लहराया । इस वर्ष उनकी हैट्रिक को 1 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं । इस पर सुहागा ये कि केन्द में भी भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गई है, तो अब जीत की हैट्रिक का जश्न तो बनता है । इसी खुशी को सार्वजनिक रूप से मनाने के बहाने आने वाले निकाय चुनावों में पकड़ बनाने के उद्देश्य से भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने जश्न को वृहत्तर स्तर पर आयोजित किया है । इस कड़ी में दो महत्वपूर्ण आयोजन किए जा रहे हैं । एक राजनैतिक व सांगठिक स्तर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रैली एवं दूसरा बौद्धिक वर्ग को संतुष्ठ करने राष्ट्रीय स्तर का साहित्यिक आयोजन, रायपुर साहित्य महोत्सव, इसी कड़ी में पहली बार आयोजित किया जा रहा है । 12 दिसम्बर को अमित शाह की रैली एवं साहित्यिक महोत्सव का आयोजन इसी मायने में महत्वपूर्ण है कि प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में आई है एवं तीसरी बार सत्ता में आने एक वर्ष भी पूर्ण हो रहे हैं । भाजपा की यह उपलब्धि कम नहीं है । ऐसा नहीं है कि भाजपा को यह उपलब्धि कोई थाली में परोसकर मिली हो । इन 11 वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई जिससे लगा कि अब भाजपा के दिन लद गए मगर पार्टी जीतने में कामयाब रही । पिछले कार्यकाल में गर्भाशय कांड से लेकर झीरम घाटी तक की वारदातों ने भाजपा की नींद उड़ा दी थी । मगर कांग्रेस अपेक्षित लाभ उठाने में नाकाम रही । इधर तीसरी बार सत्ता में आई भाजपा के लिये यह एक वर्ष भी काफी दुखदायी रहा है । हाल ही में नसबंदी कांड , फिर नक्सल हमले में जवानों की मौत और फिर नवजात शिशुओं की लगातार मौतों ने सरकार को परेशानियों के साथ साथ सवालों के कटघरे में भी खड़ा कर दिया है । विपक्षी दल कांग्रेस लगातार इन मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है मगर आम जनता में किसी तरह न तो कोई जन आंदोलन खड़ा हुआ न ही सामाजिक स्तर पर कोई ठोस विरोध के साथ सामने आया । कुल मिलाकर राजनैतिक विरोध की आड़ में संवेदनशील मद्दे दब कर रह गए। काँग्रेस ने तमाम तरीके अपनाए यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी राय सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए , मगर आब तक तो कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया । विपक्षी दल कांग्रेस ने इन हादसों को लेकर साहित्य महोत्सव का भी विरोध किया । साहित्यकारों से महोत्सव में शामिल न होने की अपील की इसका आगे क्या असर होगा यह तो समय बताएगा मगर अब तक तो किसी साहित्यकार ने काँग्रेस की अपील को गंभीरता से लिया हो ऐसा लगता नहीं है । विपक्षी दल के नाते कांग्रेस का विरोध भी अपनी जगह ठीक है । यदि भाजपा विपक्ष में होती तो वह भी यही करती । बात साहित्यकारों की करें तो यह बात काफी दुखद भी है कि पूर्व में भी किसी घटना पर कभी भी साहित्यकारों की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती रही । विशेष रूप से छत्तीसगढ में गर्भाशय कांड, झीरम घाटी ,नसबंदी कांड , नवजात शिशुओं की मौत से लेकरअभी या पूर्व में भी नक्सली हमलों में मारे गए जवानों का मामला हो, इन किसी भी हादसों में अंचल के साहित्यिक बौद्धिक हलकों में कोई प्रतिक्रिया दिखलाई नहीं दी । इससे इन आत्मकेन्द्रितों की संवेदनशीलता का अंदाजा लगाया जा सकता है । ऐसे लोगों से अपील करने का क्या तुक? और इसका नतीजा भी कुछ कुछ देखने मिला जब अखबारों में कुछ साहित्यकारों के साक्षात्कारों में उन्होंने खुलकर कांग्रेस की अपील को खारिज कर दिया। वैसे यह ठीक भी है कि कांग्रेस के कहने से कोई क्यों चले ? लोग कहने लगे कि अशोक बाजपेयी ने तो दशकों पूर्व कांग्रेस के शासनकाल में भोपाल गैस त्रासदी के ठीक बाद हुए साहित्यिक महोत्सव में कहा था कि मुर्दो के साथ मर नहीं जाते । कल भी साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि महोत्सव है कोई मनोरंजन नहीं जिसका विरोध किया जाय , इतने वरिष्ठ और विद्वान साहित्यकार ने प्रतिक्रिया में कहा तो ठीक ही होगा । विभिन्न मसलों पर अक्सर बौद्धिक साहित्यिक वर्ग सर्द खामोशी ओढ़े रहता है । इक्का दुक्का साहित्यकारों को छोड़ सराकरी प्राश्रय प्राप्त साहित्यकार अक्सर चुप रहकर अपनी रोटियाँ सेकते रहते हैं । एक सतही और चलताऊ सा तर्क दे देते हैं कि हर घटना पर कोई झण्डा उठा लेना, धरना देना या सड़क पर आना तो जरूरी नहीं है ... मुद्दों से कन्नी काट जाने का यह अच्छा बहाना होता है । इस बीच नक्सलियों के हमले में एक बार फिर जवानों की मौत हुई । नक्सल मोर्चे पर सरकार लगातार नाकाम हो रही है । अब तो केन्द्र में भी भाजपा की सरकार है तो ठीकरा केन्द्र पर मढ़ना भी संभव नहीं हो पा रहा है । केन्द्रिय गृहमंत्री आए और राजधानी से ही लौट गए । बस्तर मुख्यालय जगदलपुर तक जाने की ज़ेहनत नहीं उठाई । छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही केन्द्र की उपेक्षा का शिकार रहा है चाहे केन्द्र में कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की । इन सब मुद्दों पर हर तरह के विरोध विपक्षी दल करते रहे हैं । यह विपक्ष का कर्म भी है और धर्म भी। मगर हकीकत ये है कि भाजपा विगत 11 वर्षों से लगातार सत्ता में काबिज है और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को फिलहाल किसी भी तरह की कोई गंभीर चुनौती मिलती दिख नहीं रही है । तो सफलता का जश्न भी लाजमी है जो अमित शाह की रैली और रायपुर साहित्य महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है । ®®®

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

संगमन-20

संगमन- 20
इस बार मण्डी, हिमाचल प्रदेश में....

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

अकार 39 में- नामवर सिंह के जीवन के कुछ अनुद्धाटित तथ्य


नामवर सिंह के जीवन के कुछ अनुद्धाटित तथ्य
http://sangamankar.com/index.php?option=com_content&view=article&id=248&Itemid=692
1960 का नामवर सिंह से जुड़ा यह गोपनीय सरकारी पत्र व्यवहार हमें'नेशनल आर्काइव' से प्राप्त हुआ है। यह पत्र व्यवहार नामवर जी के शुरूआती जीवन की एक पूरी छवि देता है। उनकी वैचारिकता, कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति प्रतिबध्दता और सक्रियता का प्रमाण भी है। सागर विश्वविद्यालय में नामवर जी की हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति तथा आगे उसे स्थायी करने के प्रति तत्कालीन वाइस चांसलर डी.पी. मिश्रा का पत्र बेहद ध्यान से पढ़े जाने की मांग करता है। इसी तरह सीआईडी रिपोर्ट भी । ये दोनों दस्तावेज नामवर जी के एक प्रतिबध्द, समर्पित,सक्रिय कम्युनिस्ट होने का प्रमाण हैं और इसका भी, कि कांग्रेसी सरकार, विशेष रूप से डी.पी. मिश्रा, किस तरह कम्युनिस्टों के प्रति सोचते और व्यवहार करते थे। …..
पूरा पढ़ें....
http://sangamankar.com/index.php




बुधवार, 3 सितंबर 2014

विकल्प विमर्श पत्रिका का विशेषांक

विकल्प विमर्श पत्रिका द्वारा साहित्य पर केन्द्रित विशेषांक का प्रकाशन किया जा रहा है । इस विशेषांक के लिए युवा / नए रचनाकारों सहित सभी रचनाकारों से कविता, कहानी,रम्य रचना, निबंध,कला, रंगमंच संगीत पर आलेख एवं आलोचनात्मक आलेख आमंत्रित किए जाते हैं । रचना भेजने के लिए कोई उम्र का बंधन नहीं है । रचनाकारों से अनुरेध है कि वे अपनी चुनिंदा , स्तरीय एवं अप्रकाशित रचनाएं ही प्रेषित करें। कविताएं अधिकतम पांच ही भेजें जिससे चयन में सुविधा हो । हास्य कविताएं स्वीकार नहीं की जायेंगी । कहानी/ आलेख एक ही भेजें। रचना के साथ फोटो सहित अपना संक्षिप्त परिचय  भी भेजें तो बेहतर होगा ।






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प्रति,
संपादक
विकल्प विमर्श
       87, निगम कॉलोनी, अग्रसेन चौक
       रायपुर- 492001 (छ.ग.)
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रचना भेजने की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर 2014 है।


संपादक   

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

विकल्प विमर्श में इस हफ्ते-






विकल्प विमर्श में इस हफ्ते-

(नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें..)
आलेख
जनता तलाश लेगी रास्ता---प्रभाकर चौबे
नरेन्द्र मोदी की बेलगाम भाषा के खतरे- जगदीश्चवर चतुर्वेदी
भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष का इतिहास बोध
ईराक: बुश और ब्लेयर द्वारा पैदा किया गया संकट--- एन्ड्रयू मुरे 

विमर्श-
अभिमन्यु की आत्महत्या -- राजेंद्र यादव
संगीत मेरे परिवार में नहीं:--- प्रियदर्शिनी कुलकर्णी

http://www.vikalpvimarsh.in/moremanoranjan.asp?Details=4759

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

हरिशंकर परसाई जयंती

प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर द्वारा हरिशंकर परसाई जयंती पर गोष्ठी का आयोजन
हरिशंकर परसाई जयंती के अवरसर पर प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर द्वारा एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया । आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि वरिष्ठ समीक्षक श्री राजेन्द्र मिश्र एवं विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल उपस्थित थे । कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रगतिशील लेखक संघ छत्तीसगढ़ के संरक्षक एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे ने की । हरिशंकर परसाई जयंती के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर द्वारा आयोजित गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में मुख्य वक्ता सुपरिचित व्यंयकार श्री विनोद शंकर शुक्ल थे । कार्यक्रम का संचालन प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर के सचिव जीवेश प्रभाकर ने किया । कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर की ओर से रायपुर इकाई के अध्यक्ष श्री संजय शाम, श्री नंद कंसारी , श्रीमती उर्मिला शुक्ल , श्री अरुणकांत शुक्ल, वरिष्ठ कथाकार एवं उपन्यासकार श्री तेजिंदर जी ने अतिथियों का स्वागत किया । सर्वप्रथम सुप्रसिद्ध व्यंगकार श्री विनोद शंकर शुक्ल ने आधार वक्तव्य प्रस्तुत किया । अपने उद्बोधन में श्री विनोद शंकर शुक्ल ने परसाई जी के लेखन पर प्रकाश डालते हुये कहा कि लोकशिक्षण में परसाई कबीर व तुलसी की परम्परा के लेखक माने जा सकते हैं । उनके सुप्रसिद्ध कॉलम 'सुनो भई साधो' एवं पूछिए परसाई से के जरिए वे लोक से जुड़कर लोगों को शिक्षित करने की कोशिश करते रहे । श्री विनोद शंकर ने आगे कहा कि परसाई जी का लोक शिक्षण कई संगठनो एवं आंदोलनों से भी कहीं यादा था । श्री शुक्ल ने आगे कहा कि आजादी के पहले प्रेमचंद ने, और आजादी के पश्चात परसाई जी ने लोकशिक्षण के लिए अतुलनीय काम दिया । परसाई जी की कथनी और करनी में अंतर नहीं था और वे अपनी बात बेबाकी से व्यक्त किया करते थे । पं. जवाहार लाल नेहरू के प्रशंसक होने के बावजूद उन्होंने नेहरू युग के मायावाद को तोड़ा एवं पंचवर्षीय योजनाओं से पनपने वाले भ्रष्टाचार की कड़ी आलोचना की । इस अवसर पर उपस्थित वरिष्ठ कथाकार एवं उपन्यासकार श्री तेजिन्दर ने परसाई जी को याद करते हुए कहा कि परसाई जी अपने साथ युवा लोगों को बड़ी सहजता में जोड़ लेते थे तथा वे लेखकीय आभा से काफी दूर रहा करते थे । उनके सानिध्य में लगातार सीखने को मिलता था । वरिष्ठ लेखक श्री अरूणकांत शुक्ल ने परसाई के निबंधों पर चर्चा करते हुए कहा कि परसाई जी धर्म और विज्ञान दोनों को कसौटी पर कसकर उसकी व्याख्या किया करते थे । श्री अरुणकांत ने कहा कि परसाई कहा करते थे कि धर्म और विज्ञान दोनो यदि गलत हाथों में पड़ जाएं तो मानव एवं मानवता दोनो खत्म होते हैं। इसके पश्चात श्री सुभाष मिश्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि हालांकि परसाई जी ने कोई नाटक नहीं लिखा मगर आज देश भर में परसाई जी की रचनाओं के नाटय रूपांतरणों का ही मंचन सबसे यादा किया जा रहा है । वरिष्ठ समीक्षक श्री राजेन्द्र मिश्र ने परसाई जी के लेखन पर अपनी बात रखते हुये कहा कि परसाई जी के लेखन का केन्द्रिीय भाव दुख है मगर उन्होंने दुख को मुक्ति की भावना से जोड़ने का काम किया । उन्होंने कहा कि परसाई मानते हैं कि मुक्ति अकेले की नहीं होती बल्कि सबके साथ होती है । श्री मिश्र ने कहा कि परसाई व्यंगकार नहीं बल्कि समग्र रूप से एक उत्कृष्ठ रचनाकार थे जिन्होंने ठोस लेखन किया । उन्होंने कहा कि परसाई 3-4 शब्दों में एक पूरा वाक्य रच दिया करते थे जो एक अद्भुत कार्य है । अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे ने परसाई के समग्र लेखन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ''हरिशंकर परसाई भारत में राजनैतिक व्यंग्य के जनक थे , वे स्पष्ट रूप से एक व्यंग्यकार थे जिस पर पूरे हिन्दी साहित्य को गर्व है'', उन्होंने कहा कि परसाई के लेखन से पूरा समय झांकता है । श्री प्रभाकर चौबे ने कहा कि परसाई एक एक्टीविस्ट भी थे। वे सहज हास्य नहीं बल्कि गंभीर व्यंय लिखते थे जो भीतर तक घाव करता ङै । परसाई स्वयं कहा करते थे कि वे लेखक छोटे हैं मगर संकट बड़े हैं इस संदर्भ में श्री प्रभाकर चौबे ने कहा कि कोई भी सत्ता एक सीमा के पश्चात लेखकीय स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं करती। कार्यक्रम का संचालन प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर के सचिव श्री जीवेश प्रभाकर ने किया एवं प्रगतिशील लेखक संघ रायपुर ईकाइ के अध्यक्ष श्री संजय शाम ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में नगर के अनेक साहित्यकार रंगकर्मी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे।