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मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

ट्रेड यूनियनों का संघर्ष काफी पुराना है-

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नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ ट्रेड यूनियनों का संघर्ष काफी पुराना है-अरुण कान्त शुक्ला
20 एवं 21 फरवरी को होने वाली यह पंद्रहवीं हड़ताल दुनिया के कोने कोने में नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ चल रहे संघर्षों का हिस्सा है। इसमें केवल मजदूरों की मांगें नहीं हैं, यह हड़ताल देश के उन करोड़ों लिए है , जो रात दिन खटते हैं लेकिन दो जून की रोटी सम्मान के साथ जुटा पाना जिनके लिए दुश्वार होता है। यह नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ कामगारों गुस्सा है

समकालीन विमर्श का एक महत्वपूर्ण पोर्टल


समकालीन विमर्श का एक महत्वपूर्ण पोर्टल शुरु किया है जिसमें समसामयिक मुद्दों पर सार्थक नए आलेखों के साथ साथ विभिन्न माध्यमों में प्रकाशित स्तरीय आलेखों का साभार प्रकाशन  किया जाता है ।
कृपया हमारी वेबसाइट www.vikalpvimarsh.in पर जाएं और अपने सुझाव दें ताकि इसे और भी बेहतर बनाया जा सके ।
संपादक
 www.vikalpvimarsh.in

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

www.vikalpvimarsh.in समकालीन विमर्श का एक महत्वपूर्ण पोर्टल



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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

पुस्तक चर्चा---किस्सा कोताह- लेखक राजेश जोशी


समकालीन विमर्श का एक महत्वपूर्ण पोर्टल शुरु किया है जिसमें समसामयिक मुद्दों पर सार्थक आलेखों का प्रकाशन किया जाएगा । इसमें स्तंत्र एवं अप्रकाशित लेख / जानकारियों के अलावा  अन्य वेबसाइट/ ब्लॉग एवं प्रिंट मीडिया में प्रकाशित महत्वपूर्ण जानकारियां एवं आलेख  भी साभार प्रकाशित किए जाते हैं । कृपया हमारी वेबसाइट www.vikalpvimarsh.in पर जाएं और अपने सुझाव दें ताकि इसे और भी बेहतर बनाया जा सके

इस बार पुस्तक चर्चा में पढ़ें..
पुस्तक चर्चा---किस्सा कोताह- लेखक राजेश जोशी
किस्सा कोताह किस विधा की रचना है इसे पढ़ते हुए हमारे सामने सबसे पहले यह सवाल आता है। राजेश जोशी खुद भी इस सवाल से जूझते हैं परंतु अपने अंदाज से। वे कहते हैं "मसलन यह उपन्यास नहीं है, आत्मकथा नहीं है, शहरगाथा नहीं है और कोरी गप्प भी नहीं है। लेकिन इन्हीं तमाम चीजों की गपड़तान से बनी एक किताब है।' पुस्तक के अंदर के पृष्ठ पर शीर्षक के साथ लिखा गया है "एक गप्पी का रोजनामचा'। रोजनामचा डायरी भी हो सकती है मगर यह पुस्तक आत्मकथा के नजदीक है। 

जीवेश प्रभाकर
 www.vikalpvimarsh.in

शनिवार, 12 मई 2012

देखें हमारी वेबसाइट



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शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

रचना-1

रचना-1
जान पहचान
बंबई की तरह
गुम हो गई यह बात भी
कि बंबई में एक पडोसी कभी
नही जानता था अपने पडोसी को ।
आज , मुंबई में
बांद्रा का एक हिन्दू
बांचता है तमाम हिन्दुओं की कुंडली
और दिल्ली के इमाम के पास है
पूरे मुसलमानों की पतरी ।
सब खुश हैं कि
आज तमाम हिन्दू , हिन्दुओं को,
मुसलमां मुसलमानों को ,
सिक्ख , सिक्खों को और
सब अपनी- अपनी बिरादरी को
पूरी तरह पहचानने लगे हैं ।
साठ बरसों में
कोई किसी से
अनजान नहीं रहा
सबकी अपने अपने लोगों से
अच्छी जान पहचान हो गई है ।

जीवेश प्रभाकर

शनिवार, 9 फ़रवरी 2008

बाबा का जीवन

बाबा का जीवन एक आदर्श था । हम सबकी उन्हें विनम्र श्रद्धांजली .