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शनिवार, 30 नवंबर 2013

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अकार ( वर्तमान अंक-36 )
अकार -36 अब इंटरनेट पर अपलोड--

मुस्लिम रैनेसॉं पर बातचीत की श्रखला -

      'अकार' ने मुस्लिम समाज, धर्म, इतिहास, के प्रख्यात अध्येताओं से बातचीत की एक श्रृंखला शुरू की है । इसमें सबसे पहले प्रो. इरफान हबीब से की गयी विस्तृत विचारोत्तेजक बातचीत प्रस्तुत की जा रही है। उसके बाद प्रो. शम्सुर्रहमान फारूकी, प्रो. शमीम हनफी और पाकिस्तान के कुछ विशिष्ट लोग होंगे । यदि यह बातचीत, बहस आगे बढ़ी तो हम इसे विश्व के अलग अलग हिस्सों में ले जाने का प्रयास करेंगे ।........
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जीवेश प्रभाकर
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बुधवार, 14 अगस्त 2013

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ और 
सवाल.....
किसकी है 26 जनवरी...किसका है 15 अगस्त......
तमाम उहापोह के बावजूद ...आज़ादी तो आज़ादी है.....
आओ इसे बेहतर बनाएं....

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

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अकार के वर्तमान अंक 35 में पढ़ें...

पॉल लाफ़ार्ज
मार्क्स की स्मृतियां
बहुत छोटीमात्र 66 पृष्ठों की एक पुरानी पुस्तक अचानक हाथ लगीसम्भवत: 1940 के आस-पास छपी होगी ।'मार्क्स के संस्मरण'।  इसमें दो संस्मरण हैं । पहला पॉल लाफार्ज और दूसरी विलहेम लीबनेख्त का । लाफार्ज के संस्मरण से पता चलता है कि मार्क्स की एक बेटी से उनका विवाह हुआ थालीबनेख्त भी मार्क्स के साथ रहे थे । ये संस्मरण मार्क्स की मृत्यु के तत्काल बाद ही लिखे हुए लगते हैं । यह पुस्तक अब हिन्दी में सामान्यत: नहीं दिखती । ये संस्मरण भी सम्भवत:उपलब्ध नहीं हैं । इन दोनों संस्मरणों में मार्क्स के अंतरंग जीवन के सर्वाधिक प्रामाणिक उल्लेख हैं ।......पूरा पढ़ें...
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मंगलवार, 30 जुलाई 2013


अकार का नया अंक " अकार-35 " प्रकाशित हो गया है साथ ही इस अंक से " अकार" अब नेट पर भी उपलब्ध है ।
 इस अंक में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की दुर्लभ टोपी की जानकारी के साथ ही आज़ाद पर सुधीर विद्यार्थी का आलेख भी है ....
आज़ाद के इतिहास पर धूल की परतें
सुधीर विद्यार्थी 
            वह चन्दशेखर आज़ाद के बलिदान का अर्धशती वर्ष था यानी 1981 का साल। शहादत हुई थी उनकी 27फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रे ड पार्क में। कंपनी बाग का वह सुनसान इलाका उस रोज क्रांतिकारी संग्राम के अनोखे रक्तरंजित अध्याय का साक्षी बना जब 'हिन्दुस्तान  समाजवादी प्रजातंत्र संघका सेनापति ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों और उनके सिपाहियों से घिराअपनी एक पिस्तौल और चंद कारतूसों से अभिमन्यु की भांति संघर्ष करते हुए शहीद हो गया....
पूरा पढ़ने के लिए
आप नीचे लिखे लिंक पर जाकर अकार एवं संगमन की संयुक्त वेबसाइट ' संगमनकार" पर "अकार " मेनू में वर्तमान अंक खंड में जाकर पढ़ सकते हैं ।
एक बार अवश्य देखें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं ।
लिंक---
http://www.sangamankar.com/ 


शनिवार, 20 जुलाई 2013

अकार का नया अंक " अकार-35 " प्रकाशित हो गया है । इस अंक से " अकार" अब नेट पर भी उपलब्ध है । आप नीचे लिखे लिंक पर जाकर अकार एवं संगमन की संयुक्त वेबसाइट ' संगमनकार" पर "अकार " मेनू में नए अंक को पढ़ सकते हैं । एक बार अवश्य देखें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं ।
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सोमवार, 15 जुलाई 2013

बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा...


बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा...
कुछ इसी तर्ज़ पर चलाया जा रहा है मोदी का प्रचार ...एक बात तो माननी होगी कि मोदी के प्रचार तंत्र में  संलग्न  प्रोफेशनल्स  अपनी प्रतिभा के बल पर पूरे देश को मोदीमय करने में कामयाब हो रहे हैं......मीडिया तो अपने व्यवसायिक लाभ के चलते  इस प्रचार तंत्र का भागीदार है ही बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मी़डिया तो अभी से पेड न्यूज में लग गया है....जिस तरह पूर्व में निर्मल बाबा के कार्यक्रम फीचर की तरह दिखाए जाते रहे फिर बाद में भंडाफोड़ होने पर अब भी उनका कार्यक्रम दिखाया जा रहा है मगर कोने में प्रमोशनल या स्पॉन्सर्ड का टैग लगा दिया जाता है , यानि देश समाज की सेवा का दंभ भरने वाला मीडिया जिस तरह निर्मल बाबा के पाखंड को एक समय उजागर करने में लगा था वो स्पॉन्सर होने के पश्चात दिखाए जा सकने की श्रेणी में ला दिया गया ,मतलब पैसा फेंको तमाशा देखो...उसी तरह मोदी के तमाम कार्यक्रम भी पैसे फिंकवाकर ही दिखाए जा सकते है.... तो मीडिया तो अपनी रोटी सेक रहा है मगर देश का बौद्धिक वर्ग भी इस मकड़जाल की गिरफ्त में फंसता जा रहा है.... एक एक शब्द ..एक एक कदम बहुत सोचा समझा और सुनियोजित सा है.. सांप्रदायिकता का बुर्का ” .. घूंघट नहीं ..क्यों??? इस तरह पूरी पटकथा जबरदस्त पूर्वानुमान के साथ लिखी जाती है जिससे पूरे देश में मोदी के पक्ष या विपक्ष दोनो में चर्चा का माहौल पैदा हो....हम आप भी इस जाल से बच नहीं  सकते क्योंकि बयानो और हरकतों से  आपको इस हद तक विचलित कर दिया जाता है कि आप प्रतिक्रिया से दूर नहीं भाग सकते....मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम इस अभियान को नजरअंदाज करना शुरु कर दें तो निश्चित रूप से मोदी के प्रचार खेमे में बेचैनी फैलेगी क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य गंभीर बहस की बजाय सनसनी फैलाना ही है....अतः अबसे आगे मोदी की चर्चा पर कुछ विराम लगाकर देखा जाए....कॉंग्रेस से ऐसी उम्मीद बेमानी है ...कॉंग्रेस तो हाल  में बौद्धिक दिवालिएपन के संक्रमण से गुजर रही है....आप लोगों के साथ यह प्रयोग करके देखना चाहता हूं....

मंगलवार, 28 मई 2013

क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज ही सुनेंगे ?


क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज सुनने के आदी हो गए हैं ?  
बस्तर में घटी दर्दनाक वारदात ने पूरे देश को पहली बार इस तरह झकझोरा है । ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसी घटना न हुई हो , चूंकि इस बार प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष , सलवा जुडूम के प्रणेता, चुने हुए विधायक और पूर्व केन्द्रीय मंत्री इस घटना के शिकार हुए इस वजह से घटना राष्ट्रीय स्तर पर बहस की वजह बन गई । चलिए इसी बहाने ही सही पहली बार नक्सल या कहें माओवादी समस्या को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की राह तो खुली । वर्ना तो हर बार राष्ट्रीय चैनलों पर छत्तीसगढ़ की घटनाएं निचली पट्टी से कभी ऊपर नहीं हो पाईं ।
            अब जब चर्चा चली तो लगा कुछ सार्थक बहस होगी. कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आय़ेंगे और नए विचारों सुझावों से कुछ समाधान की गुंजाइश भी निकलेगी । मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । दिल्ली के वातानुकूलित स्टुडियो में बैठकर लगभग सभी लोगों ने बातें तो बड़ी बड़ी कीं मगर सब जमीनी हकीकत और व्यवहारिकता से कोसों दूर रहीं ।
जिस तरह पंडित भक्तों को ईश्वर के आध्यात्मिक अस्तित्व के मायाजाल में उलझाकर उन्हें उसकी लीला में मग्न करता रहता है उसी तरह नक्सली आध्यात्म के कुछ पैरोकार जाने किस बिला पर बहस को तर्क से हटाकर आध्यात्म में तब्दील करने का प्रयास करते रहते हैं ।  नक्सलियों के आध्यात्मिक और दार्शनिक समर्थकों की बातें तो  समझ में ही नहीं आतीं । शायद हम उस लायक न हों , जैसे प्रवचनकार कहता है बच्चा अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना है ...ईश्वर इतनी आसानी से नहीं मिलते...ज्ञान के मार्ग पर चलना तो दूर, तुम जैसे तुच्छ प्राणियों के लिए  इसे खोज पाना भी दुश्कर होगा जब तक कि कोई प्रकाण्ड पंडित तुम्हें न बतलाए.......चैनलों पर जब इन विद्वानों को सुनो तो लगता है हमसा मूर्ख और अज्ञानी तो इस पूरे ब्रह्माण्ड में नहीं है.....हमारा जीवन ही व्यर्थ गया .....हम जहां रहते हैं उसकी समस्याएं भी नहीं समझ पाए...इसके लिए भी हमें दिल्ली पर निर्भर रहना है.....(जो खुद समस्या की जननी है....) धिक्कार है....हमें तो शुक्रगुजार होना चाहिए इन चैनलों पर आने वाले महान विशेषज्ञों का जिन्होंने हमें सत्य से साक्षात्कार कराया....अहोभाग्य......एक्सपर्टजी तुम चंदन हम पानी......वो बताते हैं दिल्ली में बैठकर कि बस्तर की असल समस्या क्या है । कोई सुरक्षा बलों की समस्या, कोई राजनीति कोई अशिक्षा, तो कोई प्रशासनिक तो कोई सामाजिक पहलुओं को समस्या की जड़ बताता नहीं थकता । कोई कहता है वहां विकास नहीं हुआ.....अरे विद्वानों हम पूछते हैं पिछले 65 सालों में 6 महानगरों को छोड़कर विकास हुआ कहां ....??.
कोई कॉर्पोरेट नैक्सस की बात खुलकर नहीं करता ..... कोई 6वीं अनुसूची की बात नहीं करता .... सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये मुट्ठीभर हिंसक नक्सली आदिवासियों के मान्य प्रतिनिधि हैं ? वो नक्सियों के तथाकथित आध्यात्मिक गुरु  और दार्शनिक पैरोकार बस्तर में आदिवासियों के विकास के लिए संघर्षरत उन संगठनो से चर्चा की बात क्यों नहीं करते जो आदिवासियों के स्वयं के संगठन है...जिनका नेतृत्व उन्हीं के अपने आदिवासियों के हाथ है.....मगर चूंकि वो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए अहिंसात्मक तरीका अपनाते हैं इसलिए उन पर किसी की नजर नहीं पड़ती । बस्तर और छत्तीसगढ़ के हर जागरूक नागरिक को मालूम है कि जब ये संगठन अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो इसमें लाखों की तादात में आदिवासी शामिल होते है ...स्वस्फूर्त ...अहिंसात्मक तरीके से....मगर न तो सरकार( केन्द्र और राज्य दोनों), प्रशासन और न ही मीडिया( राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय) इस पर कोई तवज्जो देता है। क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज सुनने के आदी हो गए हैं ?  हमें इस बात पर गौर करना होगा और यदि आदिवासियों , विशेषकर बस्तर के लिए कुछ करना है तो आदिवासियों के इस बहुसंख्य अहिंसक समाज को मुख्यधारा में लाकर उन्हें अपनी चर्चा के केन्द्र में लाना होगा ।