कुल पेज दृश्य
शनिवार, 23 मार्च 2013
बुधवार, 20 मार्च 2013
मंगलवार, 19 मार्च 2013
पुस्तक चर्चा- पांसे और सपना मेरा यही सखी: राजेश जोशी
कवि राजेश जोशी के दो नाटकों का संग्रह सीधे-सीधे दोनों के नाम से छपा है- पांसे और सपना मेरा यही सखी नाटकों की प्रकृति के अनुसार दोनों में लोक की छौंक है। वैसे जिसने आल्हा-पंडवानी सुनी न होगी, उसके लिए यह जान पाना आसान नहीं; पर कहना होगा कि यह छौंक इतनी गाढ़ी है कि जाने बिना भी आस्वाद काफी जायकेदार होगा। लेकिन दूसरे में यह अंदर से उद्भुत है- कवयित्रियों में समाए हुए को उसी संसक्ति के साथ उजागर कर दिया गया है-....पूरा पढ़ें...
www.vikalpvimarsh.in
www.vikalpvimarsh.in
मंगलवार, 12 मार्च 2013
शुक्रवार, 8 मार्च 2013
महिला दिवस पर ...इरोम शर्मिला की कविता
महिला दिवस पर ...
मैं क्या कह सकता हूं ?
..
हर दिन... हर पल संघर्षरत
विश्व की तमाम महिलाओं के नाम....
इरोम शर्मिला की कविता ही सब कहती
है........
कांटों की चूडि़यों जैसी बेडि़यों से
मेरे पैरों को आजाद करो
एक संकरे कमरे में कैद
मेरा कुसूर है
परिंदे के रूप में अवतार लेना
कैदखाने की अंधियारी कोठरी में
कई आवाजें आसपास गूंजती हैं
परिंदों की आवाजों से अलग
खुशी की हंसी नहीं
कोई लोरी नहीं
मां के सीने से छीन लिया गया बच्चा
मां का विलाप
पति से अलग की गई औरत
विधवा की दर्द-भरी चीख
सिपाही के हाथ से लपकता हुआ चीत्कार
आग का एक गोला दीखता है
कयामत का दिन उसके पीछे आता है
विज्ञान की पैदावार से
सुलगाया गया था आग का गोला
जुबानी तजुर्बे की वजह से
ऐन्द्रिकता के दास
हर व्यक्ति समाधि में है
मदहोशी-विचार की दुश्मन
चिंतन का विवेक नष्ट हो चुका है
सोच की कोई प्रयोगशाला नहीं
चेहरे पर मुस्कान और हंसी लिए हुए
पहाडि़यों के सिलसिले के उस पार से आता हुआ यात्री
मेरे विलापों के सिवा कुछ नहीं रहता
देखती हुई आंखें कुछ बचाकर नहीं रखतीं
ताकत खुद को दिखा नहीं सकती
इंसानी जिंदगी बेशकीमती है
इसके पहले कि मेरा जीवन खत्म हो
दो मुझे अंधियारे का उजाला
अमृत बोया जाएगा
अमरत्व का वृक्ष रोपा जाएगा
कृत्रिम पंख लगाकर
धरती के सारे कोने मापे जाएंगे
जीवन और मृत्यु को जोड़ने वाली रेखा के पास
सुबह के गीत गाए जाएंगे
दुनिया के घरेलू काम-काज निपटाए जाएंगे
कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो
मैं किसी और राह पर नहीं जाऊंगी
मेहरबानी करके कांटों की बेडि़यां खोल दो
मुझ पर इल्जाम मत लगाओ
कि मैंने परिंदे के जीवन का अवतार लिया था।
0 इरोम शर्मिला
(विष्णु
खरे द्वारा अंग्रेजी से अनूदित। ‘अनौपचारिका’ अगस्त, 2010 से साभार।)
गुरुवार, 7 मार्च 2013
एक कहानी- शरणदाता' - अज्ञेय
www.vikalpvimarsh.in में आज अज्ञेय के जन्मजिवस पर पढ़ें उनकी एक रचना...
शरणदाता' - अज्ञेय
रंफीकुद्दीन का आश्वासन पाकर देविन्दरलाल रह गये। तब यह तय हुआ कि अगर खुदा न करे कोई खतरे की बात हुई ही, तो रंफीकुद्दीन उन्हें पहले खबर भी कर देंगे और हिंफाजत का इंतजाम भी कर देंगेचाहे जैसे हो। देविन्दरलाल की स्त्री तो कुछ दिन पहले ही जालन्धर मायके गयी हुई थी, उसे लिख दिया गया कि अभी न आये, वहीं रहे। रह गये देविन्दर और उनका पहाड़िया नौकर सन्तू। किन्तु यह व्यवस्था बहुत दिन नहीं चली। चौथे ही दिन सवेरे उठकर उन्होंने देखा, सन्तू भाग गया है।...पूरी पढ़ें..
www.vikalpvimarsh.in
शरणदाता' - अज्ञेय
www.vikalpvimarsh.in
बुधवार, 6 मार्च 2013
रेल भी बाजार के हवाले--प्रभाकर चौबे
सदस्यता लें
संदेश (Atom)





