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मंगलवार, 28 मई 2013

क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज ही सुनेंगे ?


क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज सुनने के आदी हो गए हैं ?  
बस्तर में घटी दर्दनाक वारदात ने पूरे देश को पहली बार इस तरह झकझोरा है । ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसी घटना न हुई हो , चूंकि इस बार प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष , सलवा जुडूम के प्रणेता, चुने हुए विधायक और पूर्व केन्द्रीय मंत्री इस घटना के शिकार हुए इस वजह से घटना राष्ट्रीय स्तर पर बहस की वजह बन गई । चलिए इसी बहाने ही सही पहली बार नक्सल या कहें माओवादी समस्या को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की राह तो खुली । वर्ना तो हर बार राष्ट्रीय चैनलों पर छत्तीसगढ़ की घटनाएं निचली पट्टी से कभी ऊपर नहीं हो पाईं ।
            अब जब चर्चा चली तो लगा कुछ सार्थक बहस होगी. कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आय़ेंगे और नए विचारों सुझावों से कुछ समाधान की गुंजाइश भी निकलेगी । मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । दिल्ली के वातानुकूलित स्टुडियो में बैठकर लगभग सभी लोगों ने बातें तो बड़ी बड़ी कीं मगर सब जमीनी हकीकत और व्यवहारिकता से कोसों दूर रहीं ।
जिस तरह पंडित भक्तों को ईश्वर के आध्यात्मिक अस्तित्व के मायाजाल में उलझाकर उन्हें उसकी लीला में मग्न करता रहता है उसी तरह नक्सली आध्यात्म के कुछ पैरोकार जाने किस बिला पर बहस को तर्क से हटाकर आध्यात्म में तब्दील करने का प्रयास करते रहते हैं ।  नक्सलियों के आध्यात्मिक और दार्शनिक समर्थकों की बातें तो  समझ में ही नहीं आतीं । शायद हम उस लायक न हों , जैसे प्रवचनकार कहता है बच्चा अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना है ...ईश्वर इतनी आसानी से नहीं मिलते...ज्ञान के मार्ग पर चलना तो दूर, तुम जैसे तुच्छ प्राणियों के लिए  इसे खोज पाना भी दुश्कर होगा जब तक कि कोई प्रकाण्ड पंडित तुम्हें न बतलाए.......चैनलों पर जब इन विद्वानों को सुनो तो लगता है हमसा मूर्ख और अज्ञानी तो इस पूरे ब्रह्माण्ड में नहीं है.....हमारा जीवन ही व्यर्थ गया .....हम जहां रहते हैं उसकी समस्याएं भी नहीं समझ पाए...इसके लिए भी हमें दिल्ली पर निर्भर रहना है.....(जो खुद समस्या की जननी है....) धिक्कार है....हमें तो शुक्रगुजार होना चाहिए इन चैनलों पर आने वाले महान विशेषज्ञों का जिन्होंने हमें सत्य से साक्षात्कार कराया....अहोभाग्य......एक्सपर्टजी तुम चंदन हम पानी......वो बताते हैं दिल्ली में बैठकर कि बस्तर की असल समस्या क्या है । कोई सुरक्षा बलों की समस्या, कोई राजनीति कोई अशिक्षा, तो कोई प्रशासनिक तो कोई सामाजिक पहलुओं को समस्या की जड़ बताता नहीं थकता । कोई कहता है वहां विकास नहीं हुआ.....अरे विद्वानों हम पूछते हैं पिछले 65 सालों में 6 महानगरों को छोड़कर विकास हुआ कहां ....??.
कोई कॉर्पोरेट नैक्सस की बात खुलकर नहीं करता ..... कोई 6वीं अनुसूची की बात नहीं करता .... सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये मुट्ठीभर हिंसक नक्सली आदिवासियों के मान्य प्रतिनिधि हैं ? वो नक्सियों के तथाकथित आध्यात्मिक गुरु  और दार्शनिक पैरोकार बस्तर में आदिवासियों के विकास के लिए संघर्षरत उन संगठनो से चर्चा की बात क्यों नहीं करते जो आदिवासियों के स्वयं के संगठन है...जिनका नेतृत्व उन्हीं के अपने आदिवासियों के हाथ है.....मगर चूंकि वो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए अहिंसात्मक तरीका अपनाते हैं इसलिए उन पर किसी की नजर नहीं पड़ती । बस्तर और छत्तीसगढ़ के हर जागरूक नागरिक को मालूम है कि जब ये संगठन अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो इसमें लाखों की तादात में आदिवासी शामिल होते है ...स्वस्फूर्त ...अहिंसात्मक तरीके से....मगर न तो सरकार( केन्द्र और राज्य दोनों), प्रशासन और न ही मीडिया( राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय) इस पर कोई तवज्जो देता है। क्या हम सिर्फ बंदूक और बारूद की आवाज सुनने के आदी हो गए हैं ?  हमें इस बात पर गौर करना होगा और यदि आदिवासियों , विशेषकर बस्तर के लिए कुछ करना है तो आदिवासियों के इस बहुसंख्य अहिंसक समाज को मुख्यधारा में लाकर उन्हें अपनी चर्चा के केन्द्र में लाना होगा ।

2 टिप्‍पणियां:

अपराजित ने कहा…

सादी बात मगर सीधी बात और वो भी पत्रकारोँ मेँ लुप्तप्राय: भोलेपन के साथ .... दादा आपके एकतारे को साधुवाद.

jeevesh chaube ने कहा…

धन्यवाद अपराजित ..मगर वो फिल्मों की बात अभी तक पूरी नहीं हुई ....